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आखिर महाभारत का युद्ध क्यों हुआ था? 5 Reason Of Mahabharat Yuddh

mahabharat yuddh ke karan kya the 


महाभारत का युद्ध history का सबसे विनाशक युद्ध माना जाता है.. यह युद्ध 18 दिनों तक चला और इसमें असंख्य सैनिक वीरगति को प्राप्त हो गये... वैसे ये युद्ध एक परिवार का था लेकिन इसमें पुरे भारत वर्ष के राजाओं ने इसमें भाग लिया था...


mahabharat yuddh


महाभारत काल में हस्तिनापुर बहुत शक्तिशाली राज्य था और इसी राज्य के कौरवों और पांडवो के आपसी झगड़े में कितने ही लोगो की लाशें बिछा दी गई.. इस युद्ध की शुरुआत कोई एकाएक नहीं हुई थी... इसके पीछे कितने ही वर्षो की चलती आ रही भाईओ की लड़ाई का परिणाम था..

इस युद्ध के होने के कई कारण थे.. बहुत सी ऐसी घटनाएँ हुई जो की इस युद्ध का कारण बनी थी... कौरवों का बड़ा भाई दुर्योधन था और पांडवों का बड़ा भाई युधिष्ठिर था... इन दोनों में से युधिष्ठिर बड़े थे और धर्म के ज्ञाता भी थे इस कारण हस्तिनापुर के युवराज बनने के लिए वो ही उपयुक्त थे... लेकिन दुर्योधन के पिता उस समय पांडू की मृत्यु के बाद राजा बन गये थे, तो दुर्योधन अपने पिता का बड़ा पुत्र होने के नाते युवराज बनने की चेष्टा रखता था...

दुर्योधन की इसी चेष्टा का परिणाम महाभारत निकला.. महाभारत के युद्ध के पीछे ये मुख्य कारण था लेकिन इस कारण के साथ साथ 5 मुख्य कारण और भी थे जिसके कारण महाभारत का युद्ध हुआ...

कुछ लोग मानते है की लाक्षागृह  , द्युत , हस्तिनापुर का विभाजन आदि महाभारत युद्ध के कारण थे लेकिन ऐसा माना उचित नहीं है क्योंकि यह सब तो साइड की घटनाएँ थी कोई प्रमुख कारण नहीं थे..
आज हम उन 5 कारणों की बात करेंगे जो की महाभारत युद्ध के प्रमुख कारण थे.. जिनके कारण ही महाभारत का युद्ध हुआ ... इसलिए आप इस पोस्ट को last तक जरुर पढ़े जिससे आप पूरी post को ठीक से समझ सके...

महाभारत युद्ध के 5 बड़े कारण

Table Of Content


महाभारत युद्ध के कारण क्या  थे ?

  1.      धृतराष्ट का पुत्र मोह
  2.      दुर्योधन की महत्वकांक्षा
  3.      भीष्म और द्रोण का मौन
  4.      कर्ण का साथ
  5.      कृष्ण के प्रस्ताव को न मानना



1.  धृतराष्ट् का पुत्र मोह


   वैसे तो हस्तिनापुर का उत्तराधिकारी बड़ा पुत्र होने के नाते धृतराष्ट् था लेकिन वो जन्म से अंधे थे..इस कारण जब भीष्म उन्हें राजा बनाना चाहते तब विदुर ने इसे निति के विरुद्ध बताकर पांडू को राजा बनाने का परामर्श दिया... इस कारण पांडु हस्तिनापुर के राजा बन गये ... और उस दिन से ही धृतराष्ट् के मन में कुंठा घर कर गई.. जब दुर्योधन का जन्म हुआ तो वो उसे भावी राजा के रूप में देखने  लगा... उन्हें अपने पुत्र से बहुत लगाव था वे येनकेन प्रकारेण दुर्योधन को राजा बनाना चाहते थे... इसलिए वे दुर्योधन की हर अनुचित मांगो को भी मान लेते थे...

धृतराष्ट् पुत्र मोह में इतने अंधे हो गये थे की उन्हें अपने पुत्र की बड़ी बड़ी गलतियाँ भी सही लगती थी... वे आँखों से अंधे थे तब तक तो कई ज्यादा नुकसान नहीं था परन्तु पुत्र मोह में अंधे होकर उन्होंने महाभारत के युद्ध को न्योता दे दिया..

पांडवों के वारणावत जाने का प्रस्ताव दुर्योधन लाया था और विदुर इसके विरुद्ध में था फिर भी वो पुत्र मोह में मना नहीं कर पाए और दुर्योधन के कुकर्म में अप्रत्यक्ष रूप से साथ दिया.. द्युत का निमन्त्रण भी धृतराष्ट् ने ही दिया था और वो जानता था की शकुनी कुटिल चाले चलेगा फिर भी पुत्र मोह में वे चुप रहे... द्रोपदी वस्त्रहरण के समय भी राजा होकर भी चुप रहे क्योंकि यह उसके प्रिय पुत्र की इच्छा के अनुसार हो रहा था..

droupdi
sanjiv thakur


इस प्रकार उन्होंने अपने पुत्र मोह में दुर्योधन की हर अनुचित गतिविधि में अप्रत्यक्ष रूप से साथ दिया जो की महाभारत युद्ध का कारण बना.. धृतराष्ट् पांडवों के ज्येष्ठ पिताश्री थे इस लिहाज से भी पांडवों का ख्याल रखना चाहिए परन्तु उन्होंने राज्य के विभाजन के समय भी अपने पुत्र मोह में हस्तिनापुर दुर्योधन को दे दिया और उजड़ा इलाका पांडवो को दे दिया...



2.  दुर्योधन की महत्वकांक्षा और शकुनी का साथ


    कौरवों में दुर्योधन सबसे बडा  था.. बचपन से ही उसे मामा शकुनी का साथ मिला .. इस कारण बचपन से ही दुर्योधन के मन में महत्वकांक्षा घर कर गई.. शकुनी ने इस आग को लगाने और उसमे निरंतर घी डालने का काम किया... शकुनी गांधारी का भाई था और दुर्योधन का मामा लगता था... शकुनी अपनी बहिन का विवाह एक अंधे व्यक्ति के साथ हो जाने से नाराज था और इसका बदला वो हस्तिनापुर से लेना चाहता था....

इस कारण उसने दुर्योधन की महत्वकांक्षा को बढ़ाने का काम किया... वो बचपन से ही दुर्योधन को पांडवों के खिलाफ भडकाने लगा था जिससे दुर्योधन के मन में पांडवों से नफरत हो गई थी... शकुनी ने ही लाक्षागृह  , द्युत आदि कुटिल चले चली थी.. वो तो हमेशा से ही पांडवो और कौरवों का विनाश चाहता था.. इसलिए उसने ही महाभारत युद्ध की नीव में पत्थर रखने कला काम किया...

दुर्योधन अपनी महत्वकांक्षा के कारण उचित-अनुचित का पता करने में नाकाम रहा.. वो सब कुछ पाना चाहता था.. जब राज्य का बंटवारा हुआ तब भी वो यह सोचता था की आधा राज्य उसके हाथो से निकल गया लेकिन वास्तविकता तो यह थी की आधा राज्य उसे मिला था...

इस कारण उसने उस आधे राज्यं को पाने के लिए द्युत का आयोजन किया और उसमें सारी मर्यादाओं को ताक में रखते हुए अपनी असभ्यता का परिचय दिया और पांडवो को कभी न भरने वाला घाव दे दियब .. जिससे भरने के लिए या यूँ कहे की अपने इस अपमान के बदले के लिए पांडव 13 वर्ष तक तपते रहे और दुर्योधन की इस महत्वकांक्षा ने महाभारत युद्ध के द्वार को खोल दिया...


महाभारत का युद्ध क्यों हुआ?

3. भीष्म और द्रोणाचार्य का मौन रहना


    भीष्म व द्रोणाचार्य महाभारत में दो अद्भुत योद्धा थे..दोनों के पास शक्ति , ज्ञान की कोई कमी नहीं थी.. भीष्म तो अजेय थे और इस कारण हस्तिनापुर एक शक्तिशाली राष्ट्र बन चूका था..

लेकिन इन दोनों को उचित समय पर मौन रहना हस्तिनापुर के लिए घातक साबित हुआ और परिणाम के रूप में भयानक युद्ध सामने आया..  जब द्रौपदी वस्त्रहरण हो रहा था तब भी यह दोनों वहां पर थे लेकिन चुप थे... यही चुपी भारत वर्ष को महंगी पड गई... यदि उस समय ये दोनों बोले होते तो मजाल किसीकी जो उनके सामने बोलने की हिम्मत करते परन्तु हस्तिनापुर सिंहासन से बंधे रहने की प्रतिज्ञा करने वाले भीष्म और गुरु द्रोण मौन ही रहे...

दोनों का मौन रहने का कारण था की वे हस्तिनापुर से बंधे थे और जो हस्तिनापुर का नरेश आदेश देते उसका पालन करना यह अपना धर्म मानते थे... और ये बात दुर्योधन भी जानता था की ये दोनों उसे छोडकर जाने वाले नहीं है यदि युद्ध हुआ तो ये उसके ही पक्ष में युद्ध लड़ेंगे जिससे उसकी विजय तो आसानी से हो जाएगी ...

इस कारण उनको अपने पक्ष में पाकर दुर्योधन युद्ध को उतारू था की जब ये दोनों उसके साथ है तो भला किस बात की चिंता... भीष्म और द्रोण उस वक्त मौन न रहकर कुछ बोले होते और दुर्योधन का विरोध किया होता तो महाभारत का युद्ध कदाचित इतना भयंकर नहीं होता...



 

4. कर्ण का दुर्योधन का मित्र होना


  यूँ तो कर्ण महारथी था .. वो उच्च कोटि का धनुर्धर था.. वो दानवीर भी था.. लेकिन इन सभी गुणों के बावजूद उसने दुर्योधन का साथ  दिया... और उसी के बलबूते दुर्योधन अर्जुन को चुनौती देता था.. दुर्योधन कर्ण को अपना मित्र मानता था लेकिन कर्ण उसे अपना मित्र न मानकर मालिक मानता था .. और उसके हर अनुचित काम में साथ देता था..

यदि कर्ण दुर्योधन को सही सलाह देता और उसे अनुचित कार्य करने से रोकता तो वो वास्तव में मित्रता के धर्म को निभाता लेकिन उसने तो सिर्फ उसकी हाँ में हाँ ही मिलाया और उसे भडकाने का काम किया..

जब भीष्म, द्रोणाचार्य और कृपाचार्य अर्जुन की शक्ति को बताकर दुर्योधन को सावधान करते तब तब कर्ण उससे कहता की अर्जुन से वो अकेल निपट लेगा वो अर्जुन को लेकर चिंता न करे .. जिससे दुर्योधन लगातार गलत मार्ग पर जाने लगा..

कर्ण दुर्योधन को अपना मालिक मानता था इस कारण जब जब दुर्योधन ने जो कहा उसने वो किया कभी भी दुर्योधन की बात नहीं काटी जिससे महाभारत का युद्ध हो गया.. यदि कर्ण उसे सावधान करता और अपने व्यक्तिगत दुश्मनी को भुलाकर यदि वो सही सलाह देता तो कुछ और ही होता...

कर्ण ने स्वयम को अर्जुन से अच्छा साबित करने के लिए महाभारत जेसे युद्ध को न्योता दे दिया और अपने मित्र को भी इसके लिए हमेशा उकसाते रहे..



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5. कृष्ण के प्रस्ताव को ठुकराना


   ऊपर जितने भी कारण लिखे है उसमें से यह सबसे महत्वपूर्ण कारण है क्योंकि यदि इस प्रस्ताव को मान लिया होता तो महाभारत का युद्ध नहीं होता..
जब पांडवों ने 13 वर्ष का वनवास पूर्ण कर लिया तब उन्होंने अपने राज्य को पुन: माँगा परन्तु दुर्योधन ने उसे देने से इंकार कर दिया.. ऐसी स्थिति में युद्ध ही एकमात्र विकल्प बचा था.. तब भगवान इस होने वाले विनाश से देश को बचाने और सब के कल्याण हेतु शांति दूत बनकर हस्तिनापुर गये...

उन्होंने वहां पर कहा कि ‘पांडवों ने अपने वचन और नियम के अनुसार 12 वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास पूर्ण कर लिया है.. अत: अब उन्हें उनका राज्य वापिस दे दिया जाए...’ लेकिन दुर्योधन ने राज्य देने से मन कर दिया  और कहा की ‘यदि आपके पास कोई दूसरा प्रस्ताव हो तो बताओं.’

तब भगवान ने पांडवों के लिए सिर्फ पांच गांवों की मांग की और कहा की आप पांच गाँव ही दे दो पांडव इन 5 गाँव से ही संतुष्ट हो जाएँगे....लेकिन दुयोधन ने कहा कि ‘ पांच गाँव क्या? मैं पांडवों को सुई की नोक के बराबर जमीन भी नहीं दूंगा.”

और उसने कृष्ण को बंधी बनाने का प्रयास किया... तब ही निश्चित हो गया की अब तो युद्ध ही होगा..
यदि युद्ध का प्रमुख कारण माने तो इस प्रस्ताव को न मानना ही है.. यदि दुर्योधन पांडवों को पञ्च गाँव दे देता तो शायद युद्ध नहीं होता...

लेकिन जो होना होता है वो तो होकर ही रहता है हम तो सिर्फ प्रयास ही कर सकते है.. और जो हो गया वो तो हो गया अब केवल यही कह सकते है की यदि ऐसा न होता तो यह नहीं होता... लेकिन भगवान कृष्ण ने Geeta में अर्जुन को समझाते हुए कहा है नकी “हमे सिर्फ कर्म पर ध्यान देना चाहिए उससे मिलने वाले फल पर नहीं.”

इसी प्रकार जिसने जैसा कर्म किया उसे वैसा ही फल मिल गया...


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जानिए कैसे महाभारत युद्ध में 5 योद्धाओं का निहत्थे वध किया गया...

Mahabharat yuddh Story in Hindi


hello दोस्तों आज हम इस post में महाभारत के अनसुने किस्से- कहानियों को आपके साथ share करेंगे...
महाभारत भारत के इतिहास का प्राचीन और बड़ा ग्रन्थ है.. महाभारत के युद्ध मे असंख्य लोगो की मौत हुई थी.. इस भयंकर  युद्ध में कई महावीरों ने भाग लिया और वीरगति को प्राप्त हुए..

इस युद्ध की जब शुरुआत हुई तब कौरवों के सेनापति गंगापुत्र  पितामह भीष्म  ( बचपन का नाम देवव्रत ) ने कुछ नियम बनाये थे जो की एक धर्म युद्ध के लिए जरुरी थे..उन युद्द के नियमों मेंसे एक यह नियम था की किसी भी निहत्थे योद्धा का वध नहीं किया जाएगा.. परन्तु जैसे - जैसे युद्ध आगे बढ़ता गया वैसे ही युद्ध के नियमों को तोडा  जाने लगा.. उस में से गंगापुत्र के द्वारा बनाये एक नियम - निहत्थे को मारा नहीं जायेगा को भी तोडा गया..

आज इस पोस्ट में हम उन 5  योद्धाओं के बारे में जानेगे जिनको तब मारा गया जब ये निहत्थे थे अर्थात उस समय उनके पास कोई अस्त्र-शस्त्र न हो..

महाभारत के युद्ध में कुछ ऐसे योद्धा थे जिन्हें मारना बहुत मुश्किल था ... और जब उनके हाथ में धनुष हो तो भीर उन्हें जितना भी मुश्किल था ... इस कारण युद्ध में उन योद्धा को निहत्था करके उनका वध किया गया..

5  योद्धा जिन्हें निहत्थे मारा गया..


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1. निहत्थे पितामह भीष्म  पर अर्जुन ने चलाएँ थे तीर


             गंगापुत्र भीष्म महाभारत के वृद्ध और बहुत ताकतवर योद्धा थे.. उन्हें अपने पिता से इच्छा मृत्यु का वरदान मिला हुआ था.. अर्थात उनकी मौत तब ही हो सकती  थी जब वे खुद मौत चाहते हो.. इस कारण उन्हें उनकी इच्छा के बिना  मारना असम्भव था.. और जब तक गंगापुत्र भीष्म जीवित थे तब तक पांडवों की जीत भी सम्भव नहीं थी क्योंकि उनके बारे में कहा जाता था की गंगापुत्र अपराजेय है अर्थात उनकी हार भी न हो सकती थी..


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पांड्वो के लिए यह समस्या थी की अब पितामह को रास्ते से कैसे हटाएँ/? तब कृष्ण भगवान ने बताया की जब तक गंगापुत्र के हाथ में धनुष है तब तक उन्हें न हो हराया जा सकता है और न ही उनका वध किया जा सकता है.. इसलिए ऐसा उपाय किया जाए की वे अपना धनुष रख दे तब अर्जुन उन्हें अपने बाणों से बिंध दे..


लेकिन उन्हें निहत्था कैसे किया जाए ? इस प्रश्न का उत्तर भी पितामह से माँगा गया तो उन्होंने बताया किन यदि कोई नारी उनके सामने आ जाए तो वे धनुष रख देंगे..
तब कृष्ण ने शिखंडी का रहस्य सभी को बताया की शिखंडी पहले के जन्म में नारी थी और इस जन्म में भी भीष्म उन्हें नारी ही मानते है..

अगले दिन भीष्म को मारने के लिए अर्जुन ने अपने रथ पर शिखंडी को बिठा लिया .. जब युद्ध भूमि में अर्जुन और पितामह का आमना सामना हुआ तो शिखंडी दोनों के बीच में आ गया.. चूँकि भीष्म शिखंडी को नारी मानते थे

इस कारण उन्होंने धनुष बाण रख दिए.. और इसी अवसर का लाभ उठाकर अर्जुन ने गंगापुत्र पर बाणों की वर्षा कर  दी .. अर्जुन ने पितामह पर इतने तीर चलाएँ की उनके पुरे शरीर में तीर आर-पार हो गये और पितामह उन तीरों से जमीन पर आ गिरे .... आर-पार हुए तीरों से बनी शैय्या  पर लेट गये..

इसप्रकार अर्जुन ने उन्हें निहत्था होने पर भी शिखंडी की ओट से तीर चलाकर शरशैया पर लेटा  दिया...


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             चन्द्रसेन राठोड़

2.  वीर अभिमन्यु का निहत्थे वध किया गया ..


               महाभारत के युद्ध में गंगापुत्र भीष्म जैसे वृद्ध योद्धा ने भाग लिया तो दूसरी तरफ वीर अभिमन्यु जैसे युवाओं ने भी भाग लिया.. युद्ध ही नहीं लड़ा अपितु ऐसा युद्ध लड़ा की दुश्मन को भी नाको चने चबवा दिए..
अभिमन्यु , अर्जुन और सुभद्रा का पुत्र था. और श्री कृष्ण का भांजा था.. वीर अभिमन्यु को अस्त्र- शस्त्र चलाना स्वयम श्री कृष्ण ने सिखाया था..

महभारत कजे युद्ध में जब कौरवों के सेनापति गुरु द्रोणाचार्य बने तो उन्होंने युधिष्ठिर को बंदी बनाने के लिए चक्रव्यूह  की रचना की... उस दिन अर्जुन लड़ने के लिए युद्ध क्षेत्र के दुसरे छोर की और चले गये थे... पांडवों में अर्जुन और श्री कृष्ण को छोड़कर किसी को भी उस व्यूह  को तोडना नहीं आता था..

इस स्थिती  में सभी चिंता में पड़ गये की अब क्या किया जाए? तो उस समय अर्जुन पुत्र वीर अभिमन्यु सबके सामने आया... और सम्राट से कहा की आप चिंता न करे , मै इस चक्रव्यूह  का भेदन करूंगा.. लेकिन अभिमन्यु को चक्रव्यूह  में प्रवेश करना तो आता था उससे बाहर कैसे निकलते है यह उसे पता नहीं था...

बाकि लोगो ने कहा की जब अभिमन्यु चक्रव्यूह का भेदन करेगा तो हम उसके पीछे पीछे अंदर चले जाएँगे...
लेकिन जब अभिमन्यु ने चक्रव्यूह का भेदन किया तो बाकी लोगो ने भी अंदर जाने का प्रयास किया लेकिन जयद्रथ ने सभी को रोक लिया... इस कारण अभिमन्यु चक्रव्यूह  में  अकेला पड़ गया... वह लड़ते लड़ते अंतिम द्वार पर आया जहाँ पर कौरवों के सभी महारथी मौजूद थे...

अभिमन्यु ने सबके साथ वीरता से युद्ध किया लेकिन उसे वो द्वार तोडना नहीं आता था... तो भी वो प्रयास करता रहा.. कौरवों के यौद्धाओ ने देखा की यह यदि यहाँ से निकल गया तो उनकी नाक कट जाएगी ..ऐसा सोचकर उन्होंने एक साथ अभिमन्यु पर हमला बोल दिया...

इस कारण अभिमन्यु का सारथी मारा गया और उसका रथ भी टूट गया... लेकिन तब भी  वो रथ का पहिया लेकर युद्ध करने लगा.. इस अवस्था में भी कौरवों के सात सात महारथियों ने मिलकर उस निहत्थे वीर बालक का वध कर दिया...

लेकिन अभिमन्यु ने मरकर भी उस दिन का युद्ध जीत लिया और अपना नाम इतिहास में अमर कर दिया...



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3.  द्रोणाचार्य का वध


     गुरु परशुराम के शिष्य और कौरवों व पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य भी उच्च कोटि के योद्धा थे. उन्हें भी मारना  या हराना बहुत मुश्किल था..

गुरु द्रोणाचार्य को भी युद्ध से हटाए बिना पांडव उस युद्ध को नहीं जीत सकते थे..इस कारण श्री कृष्ण ने द्रोणाचार्य को मारने का एक उपाय बताया की -'द्रोणाचार्य को यदि किसी प्रकार से शोक में डाल  दिया जाए तो वे शस्त्र छोड़ देंगे..' और भीम से कहा की तुम अश्वथामा नामक हाथी  को मार दो और गुरुवर से कहो की अश्वथामा मारा गया..

भीम ने ऐसा ही किया .. भीम की बात सुनकर द्रोणाचार्य बहुत दुखी हुए लेकिन उन्हें भीम की बात पर विश्वास नहीं हुआ.. बात की वास्तविकता जानने के लिए उन्होंने युधिष्ठिर  पूछा की यह बात सही है क्या कि -'मेरा पुत्र युद्ध भूमि में मर गया?" तब युधिष्ठिर ने कहा की -' अश्वथामा मारा गया, नर नहीं कुंजर..' लेकिन कुंजर शब्द कहने से पहले ही कृष्ण ने शंख बजा दिया जिससे द्रोणाचार्य उसे सुन नहीं पाये...

और अपने पुत्र शोक में शस्त्र त्याग कर भूमि पर बैठ गये.. उसी समय द्रोपदी के भाई धृष्टद्युम्न ने तलवार से द्रोणाचार्य का वध कर दिया...
इस प्रकार दूसरी बार पांडवों ने युद्ध नियम को तोड़ते हुए निहत्थे योद्धा की हत्या कर दी...



4. दानवीर कर्ण का निहत्थे वध किया गया...


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      दानवीर कर्ण कौरवों की सेना के प्रमुख सेनापति थे.  जहाँ पांडवों के पास गांडीवधारी अर्जुन थे तो कौरवों के पास परशुराम शिष्य कर्ण थे... कर्ण महान योद्धा थे.. लेकिन वो अपने पुरे जीवन में सम्मान को तरसते रहे..  उन्होंने परशुराम जी से शिक्षा ग्रहण की लेकिन जब परशुराम को पता चला की कर्ण ब्राह्मण नहीं है. तो उन्होंने उसे शाप दे दिया की जब उसे अपनी विद्या की सबसे अधिक जरूरत होगी तो वो अपनी विद्या भूल जाएगा ...

इस कारण कर्ण जब अंतिम दिन अर्जुन के साथ युद्ध कर रहे थे तो वो अपनी विद्या भूल गये और एक ब्राह्मण के शाप के कारण उनके रथ का पहिया जमीन में धँस गया...

कर्ण अपने अस्त्र शस्त्र छोडकर रथ का पहिया निकाल रहे थे तब अर्जुन ने निहत्थे कर्ण पर दिव्यास्त्र का प्रयोग किया और कर्ण का वध कर दिया..
इसप्रकार उस महान योद्धा का छल से अंत कर दिया गया...


5. भूरिश्रवा का सात्यकी द्वारा वध


    महाभारत के युद्ध में जिन योद्धाओं का निहत्थे वध किया गया उसमे से भूरिश्रवा भी एक थे.. भूरिश्रवा कुरुवंशी थे और वे दुर्योधन की और से युद्ध में शामिल हुए थे...

युद्ध के एक दिन भूरिश्रवा और सात्यकी आपस में युद्ध लड़ रहे थे तब सात्यकी लड़ते लड़ते बेहोश हो गया.. भूरिश्रवा बेहोश सात्यकी को मारना चाहते थे.. उनसे कुछ दूर अर्जुन युद्ध कर रहे थे, उन्होंने भूरिश्रवा के इरादे को भांप लिया और एक ऐसा तीर चलाया की भूरिश्रवा का दाहिना हाथ कट गया..

भूरिश्रवा ने इसे युद्ध नियमों के विरुद्ध बताते हुए युद्ध भूमि में ही धरने पर बैठ गया... तभी सात्यकी को होश आ गया... उसने भूरिश्रवा को समाधि लगाये देखा तो अपनी तलवार से उसका वध कर दिया...
और सात्यकी जैसा वीर ने भी एक निहत्थे योद्धा को मारकर युद्ध नियम को
तोडा था...


दोस्तों इस प्रकार महाभारत के जिस युद्ध को धर्म और अधर्म के मध्य का युद्ध कहा जाता है उसमे कई ऐसी घटनाएँ हुई जो धर्म विरुद्ध थी.. जिसमे मानवता भी शर्मसार हुई और वीरो की वीरता भी कलंकित हुई..


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