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यादें 35 नंबर की .... best hindi emotional story

Heart Touching Story  in hindi



लम्बे वक्त तक साथ रहने के बाद एकाएक बिछुड़ना कठिन होता है.. मन को समझान पड़ता है.. जिस जगह पर रहे है उसका हर कोना कुछ न कुछ याद दिला जाता है ... मैने भी 3 घंटे अकेले ऐसे ही सवाल पूछते कमरे में बिताये.... इस से अधिक मैं वहाँ रुक न सका... 

heart touching story

Yaden Room  Number 35 Ki


याद जब आती है तो मेलें में अकेला कर जाती है, हजारों के पास होने पर भी किसी के न होने का अहसास दिला जाती है.. जिस स्थान से जो यादें जुडी होती है वो जगह हर क्षण गुजरे कल के उन पलों की याद दिलाती है.. उनसे जुडी हर वस्तु उनके पास न होने पर भी पास होने का अहसास दिला अकेलापन महसूस करा देती है...

 ऐसी ही कुछ यादें जुडी हुई है 35 नंबर के साथ... वैसे 35 नंबर न कोई lucky नंबर है और न ही किसी महबूबा के मकान का नंबर है .. उदयपुर में फतेहसागर झील जहाँ कितने ही  मजनूं अपनी लैला की तलाश में शाम के समय भँवरे की भांति मंडराते है .. किसी को तो कली मिल जाती है तो किसी को मुरझाएं हुए फूल से ही संतोष करना पड़ता है...

उसी झील से थोड़े से फासले पर स्थित विद्या भवन के जुबली हॉस्टल के प्रथम तले का कमरा, जिसे सब रूम नंबर 35 के नाम से जानते है. कॉलेज जीवन के सबसे यादगार पल हॉस्टल के ही होते है और ऐसी ही कुछ यादें इस कमरे के साथ जुडी हुई है...

पिछले दो बसंत से यह कमरा अपने बाशिंदों की चहलपहल से आबाद रहा..वैसे तो इस कमरे पहले भी कई मुसाफिर रह चुके है परन्तु हम जैसा कोई राहगीर नहीं मिला होगा...


मिलकर किसी को रुलाना, फिर रोते को हंसाना;
हो चाहें ख़ुशी या गम हर पल को साथ में जीना...


यही विशेषताएँ यहाँ के बाशिंदों को ओरों से अलग करती थी....

कॉलेज खत्म होने के बाद सब साथी अपने अपने गाँव की ओर प्रस्थान कर चुके थे.. लेकिन मैं पहले ही यहाँ रहने का निश्चिय कर चूका था मगर मुझे अपना निश्चिय इतना जल्दी बदलना पड़ेगा, मुझे भी पता नहीं था.. वैसे भी भविष्य को किसने देखा है जब होता है तब ही पता लगता है की क्या होने वाला था, और कभी कभी तो होने के बाद ही पता चलता है...

सभी को विदा करने के बाद पीछे रह गये थे मै और 35 नंबर वाला कमरा...जो अपने में २ बसंत की यादों को समेटे किसी के होने का अहसास दिलाता था...सभी को विदा  करने के बाद कमरे में आकर लेट गया और अपने में ही खो गया... तभी लगा कोई बरामदे में टहलते हुए जोर जोर से गा रहा है-

"बन्ना थारे धुंधलियाँ धोरां में
  म्हारी चलती मोटर थाकी....."


गीत के बोल रिपीट हो रहे थे और आवाज तेज हो रही थी...उसने गाना बंद किया और कहने लगा -'बाबु....ऐ बाबु... बाबु.....उठ जा बाबु... '

'जसवीरसा!' मैने जोर से पुकारा, सामने से कोई जवाब नहीं आया...

अपने आप को सम्भालते हुए उठ बैठा और अपने आसपास देखा तो पाया की कमरे में तो अकेला ही हूँ ऊपर छत पर लगा पंखा धीमी गति से घूम रहा था और मच्छर भिनभिना रहे थे..खिड़कियाँ बंद थी और कुर्सियां किसी के बैठने के इंतजार में पलक पावड़े बिछाए खड़ी थी...

अभी उठ कर अंगड़ाई ही ली थी कि लगा कोई कह रहा है-'जरा धीरे से, आवाज मत करों, जसवीरसा पढ़ रहे है... पलट कर देखा तो वहाँ कोई नहीं था..

दरवाज़ा, खिड़कियाँ, टेबल, कुर्सियाँ सबको देख ऐसा लग रहा थी की यह कुछ कहना चाहते है... जब हम अकेले होते है तो हवाएँ भी बातें करती है, खिड़कियाँ किसी की याद दिलाती है, पंखा भी बतियाता है बस जरूरत होती है तो सुनने वाले की .... आज  अकेला था  मुझे भी किसी की जरूरत थी और उन्हें भी किसी की जरूरत थी...


इस बात को समझते हुए दरवाजे के पास वाली टेबल बतियाने लगी -'  मुसाफिर! कहाँ गये तेरे वो हमराही....? कहाँ गया वो आशिक दीवाना...? जिसके हाथो के प्रहारों  को मैने कई बार झेले है...जब वो रात रात भर जागता
था तब मैने उसे अपनी गोद में सुलाया है... बताओं कहाँ गया वो...?

पर मैं चुप था....

बिना उत्तर की प्रतीक्षा किए उसने पुछना जारी  रखा ....'सब के सुख दुःख का साथी; सैकड़ों दिलों का राजा... अपने अंदर रहस्यों का समन्दर रखने वाला वो बाशिंदा कहाँ गया,,,?'

'किसी को हंसाने से पहले खुद ही हंस जाता, जब हंसता तो खुद को ही नहीं सम्भाल पाता.... हँसना - हँसाना ही उसका काम था वो गोल-मटोल , जोली कहाँ गया?'

लेकिन मैं फिर भी चुप था.... बोलकर क्या बताता की अब तेरे बाशिंदे नये ठिकाने पर चले गये है तो उसे कितना दुःख होता,,,,,

लेकिन वे अब भी कातर दृष्टि से मुझे देख रहे थे जैसे अब मेरे होठ खुलंगे और जवाब देंगे... पर मै तो खुद ही अकेला था... क्या करता... जब उनकी दृष्टि मुझ पर से नहीं  हटी तो मैने अपनी आँखे बंद कर ली...

परन्तु जिस प्रकार पानी देखने से प्यास नहीं बूझ सकती उसी प्रकार आँखे बंद कर लेने से सामने जलती आग नहीं बूझ सकती... लेकिन ओर करता भी क्या?

जब भी कमरे से ध्यान हटाने की कोशिश करता तो लगता कोई गा रहा है -
:
 "ओ फिरकी वाली तू कल फिर आना
नही फिर जाना तू अपनी ज़ुबान से
के तेरी नैना है शराब बेईमान से
ओ मतवाली यह दिल क्यूँ तोड़ा
यह तीर काहे छ्चोड़ आ नज़र की कमान से
के मार जायुंगा मैं बस मुस्कान से "

पर आखों के आगे तो सब सुना सुना था न कोई फिरकी वाली थी न ही कोई साथी  था....

तभी सोचा उठ कर कुछ खा लूँ पर याद आया गुड-चने रखने वाला तो अब यहाँ नहीं है फिर भी मन कठोर कर हल्के हाथो से अलमारी को खोला...तो सामने का नज़ारा देख हक्का बक्का रह गया.. अंदर कुछ मच्छर खो-खो खेल रहे थे दोएक ने तो मुझे विपक्षी टीम का समझकर आउट कर दिया... मैने भी उनके खेल में दखल नहीं देते हुए अलमारी को जैसे खोली थी ऐसे ही बंद कर दी....

मन बहलाने के लिए उठ कर बरामदे में आ गया परन्तु यहाँ भी एकांत था.. जो कभी मुझे पसंद था लेकिन आज विष बाण की भांति चुभ रहा था... थोडा टहल कर पुन: कमरे में आ गया...


पंखा अब भी धीमी गति से चल रहा था और मैने भी उसे तेज़ करने की कोशिश नहीं की, पलंग पर बिस्तर आधा समेटा पड़ा था...दिवार वाले हेंगर पर एक आधा  काला आधा सफेद  पेंट लटक रहा था जो अपने पर गिरती पपड़ी से असली रंग के अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है, पास में ही लटकता मटमैला कमीज जिसमे से झांकते कुछ सफेद बिंदु कमीज के कभी सफ़ेद होने का अहसास दिला रहे थे...
 

इन सब के अलावा कमरे में मैं और अलमारी में वो खो खो खेलते मच्छर थे...

इस अनचाहे एकांत में जो लम्हे याद आ रहे थे वो किसी पत्थर को भी पिघला सकते थे ...लेकिन अब वो सब कहाँ जो हमने साथ में बिताया.....


 रात-रात भर चलती बातें
जाग कर बिताई वो रातें
कभी अपना, कभी उसका हाल सुनाते
कुछ अपनी, कुछ उनकी सुनते-सुनाते
साथ गाते, साथ पीते
हर पल को साथ ही जीते ...
     
उन साथ बिताएं लम्हों की यादे तीर की भांति दिल को चुभ रही है पर नम आंखे हो रही है...
वैसे तो कुछ बसंत का साथ था अपना पर लगता है जैसे युगों युगों के हमराही आज बिछुड़ गये हो...
अब 35 नंबर की प्रत्येक वस्तु सवाल कर रही है... बीते पलों को याद दिला रही है... इन सब के बीच अकेले रहना बहुत मुश्किल हो रहा है इसलिए अपने निश्चिय को बदलकर रूम नंबर  35 को अलविदा कह रहा हूँ...

 यह कमरा अब अकेला हो जायेगा और इंतजार करेगा अपने नये बाशिंदों का ताकि उन्हें वो अपने  सिरफिरे, अलबेले बाशिंदों की कहानी सुना सके.... अपना दर्द बयाँ कर सके....


viram singh story

विरम सिंह देवड़ा 


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गुरू और शिष्य की कहानी Guru or shishy ki kahani in hindi

           प्रेरक कहानी Motivational story

एक समय  की  बात  है  एक गांव  मे एक गुरु जी रहते थे । वे बहुत ज्ञानी और विख्यात महात्मा थे। उनके बारे मे कहा जाता था कि उन्हे एक ऐसे मंत्र का ज्ञान प्राप्त है जिससे मृत व्यक्ति भी जिन्दा है।

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जब इस बात का पता गांव वालो को लगा तो कई लोग उनके शिष्य बन कर उनकी सेवा करने लगे, जिससे कि गुरूजी प्रसन्न हो कर उन्हे वो अद्भुत मंत्र दे ।
एक युवा आदमी भी यही विचार करके गुरूजी की सेवा करने लगा ।
वह नित्य समय पर आता और गुरूजी की सेवा करता था ।
सभी शिष्य गुरूजी से जीवन दान देने वाला मंत्र देने की मांग करते तो गुरूजी यह कहकर टाल देते की समय आने पर वह मंत्र दिया जाएगा । समय बितता गया ।

एक दिन गुरूजी ने सभी शिष्य को बुलाते हुए कहा कि मै आप लोगो को वह मंत्र दे रहा हू लेकिन आपका उसे एक साल तक सिद्ध करना होगा तभी यह मंत्र काम करेगा।
गुरूजी ने सभी को वह मंत्र दे दिया । लेकिन संयोगवश वह युवा शिष्य उस दिन गुरुकुल नही आया था।
सभी लोग मंत्र सिद्ध करने मे लगे गय, जब अगले दिन वह युवा शिष्य आया तो उसे इस बात का ज्ञान हुआ की गुरूजी ने सभी को मंत्र दे दिया और वे सभी उसे सिद्ध करने के लिए तपस्या कर रहे है।

युवा शिष्य दौङता हुआ गुरूजी के पास गया और उनसे मंत्र देने की विनती करने लगा । गुरूजी ने कहा कि उन्होंने कल सभी को मंत्र देन दिया तुम नही आए ये तुम्हारी गलती है अगली बार ऐसा समय आएगा तब मै तुम्हे मंत्र दुंगा।

शिष्य ने सोचा पता नही वह समय कब आए तब तक मेरे साथी मंत्र को सिद्ध भी कर लेगे । यह सोचकर वह गुरूजी के पिछे हि पड़ गया और मंत्र देने की विनती करने लगा।
सोते उठते, खाते-पीते हर समय वह गुरूजी से मंत्र देने की मांग करता । गुरूजी भी उससे परेशान हो गए ।

एक दिन गुरूजी निवृत्त होने जंगल मे जा रहे थे तो शिष्य भी उनके पीछे हो गया और मंत्र देने की मांग करने लगा।
गुरूजी ने कहा समय आने पर दुंगा ।
शिष्य आज उनसे मंत्र लेने का निश्चय कर के आया था और गुरूजी निवृत्ति के लिए बैठे वहा जाकर कहने लगा गुरूजी मंत्र ।
 गुरूजी गुस्सा हो गए और कहा " टेम दैखे न कटेम भाग अठै सूं "
शिष्य ने सोचा यही मंत्र है और वह खुश होकर उस मंत्र का जाप करने लगा ।



प्रेरक कहानी


कुछ समय बाद गांव मे एक युवा लड़के की मौत हो गई । उसकी अभी कुछ समय पहले शादी हुई थी । सभी बहुत दुखी थे । उस व्यक्ति के शव को श्मशान घाट लाया गया । तभी लोगो को याद आया कि यहा पर कुछ लोग है जो मृत व्यक्ति को जिन्दा करने का मंत्र का जप कर रहे है। सभी लोगो ने उन्हे बुलाया ।   सभी शिष्य आए और मंत्र का प्रयोग किया लेकिन कोई असर नही  हुआ ।

किसी ने कहा कि एक ओर साधु है वह भी तपस्या कर रहा है उसे बुलाया जाए ।उसे युवा साधु को बुलाया गया । उसने आते ही मंत्र का प्रयोग किया " टैम देखे न कटैम भाग अठै सूं " और अचानक मृत व्यक्ति जीवित हो गया ।

सभी शिष्य गुरूजी के पास गए और कहने लगे कि आपने उन्हे गलत मंत्र दिया और उसे को सही ।
गुरूजी ने कहा कि मैने तो उसे मंत्र नही दिया ओर कहा कि उसको बुलाओ।
वह युवा शिष्य आया तो गुरु ने पुछा की मैने तुझे मंत्र कब दिया ।
शिष्य ने कहा कि आपने दिया था " टैम देखे न कटैम देखे भाग अठै सू "
गुरू ने कहा यह मंत्र नही था यह तो मैने तुझे जाने के लिए कहा था । यह तेरी श्रद्धा और भक्ति से सिद्ध हो गया ।


शिक्षा   इस कहानी से दो शिक्षा मिलती है ।

     ● जो भी काम करो उसे निरन्तर करो एक दिन भी उसे नही छोडना चाहिए । जैसे इस कहानी मे वह शिष्य एक दिन नही आया और मंत्र पाने से चुक गया ।
    ● दूसरी शिक्षा मिलती है कि जो काम करो पुरे मन लग्न और श्रद्धा के साथ करो तो वो निश्चित ही पूर्ण होता है । जैसा कि शिष्य ने अपने लग्न से डाँट को मंत्र के रूप मे सिद्ध कर दिया ।


आपको हमारा यह लेख कैसा लगा कमेन्ट करके जरूर बताय ।


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आरक्षण का भुक्तभोगी हिन्दी कहानी story on reservation


Story On Reservation Policy

हिन्दी कहानी " आरक्षण का भुक्तभोगी  "

'Good Morning Sir ' चपरासी ने विनम्रता के साथ  Files को Set कर रहे बड़े साहब का अभिवादन किया ।
'Good Morning , और रामलाल क्या हालचाल है? ' अपनी नजर उठाये बिना ही सिंह साहब ने पूछा ।
'सब ठीक है साहब! हमारे जिले के कलेक्टर साहब Transfer हो गया है ।'  रामलाल ने जानकारी देते हुए कहा ।
' क्या? कौन आया है अब उनकी जगह ' सिंह साहब ने आश्चर्य से पूछा ।
' कोई वर्माजी है साहब । '

reservation


'अच्छा ठीक है तुम जाओ और सुनो आज का अखबार चेम्बर मे पहुंचा देना ।' सिंह साहब ने आदेश देते हुए कहा ।
'जी साहब '
सिंह साहब अपने काम मे Busy हो गये और Table पर बिखरी फाइलों को निपटाने लगे।
इतने मे रामलाल अखबार लेकर आ गया और  पेपर Table पर रख कर चला गया ।

सिंह साहब फाइलों के ढेर से अपने आप को बाहर निकाल कर अखबार पढने लगे ।
' अरे यह क्या ? इसे तो मै जानता हूँ ।' अखबार मे छपी Photo देखकर मन ही मन कहा ।

स्मृति पटल पर पुराने दृश्य उभर कर सामने आने लगे । बचपन मे हम दोनो साथ ही पढते थे और हमेशा साथ साथ स्कूल जाते थे । हम दोनो के हालात एक जैसे ही थे । पर वर्माजी की जाति आरक्षण पाने वाली मे से थी इसलिए उसे Government की तरफ से Help भी मिलती थी। लेकिन मुझे कुछ नही मिलता था क्योंकि मे General Category से था ।

12 वी की परीक्षा First Division से Pass करने के बावजूद शहर की College मे प्रवेश नही मिला । जबकि वर्माजी के काम Marks के बावजूद selection हो गया ।

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उस वक्त मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ ऐसा क्यो?
तब मेरा आरक्षण से पहली बार सामना हुआ   । उसके बाद तो यह सिलसिला चलता ही रहा । अच्छे Marks आने के बावजूद भी न कोई Government की तरफ से छात्रवृति मिलती और न कोई सरकारी नौकरी मे फायदा मिलता । लेकिन आरक्षण से कम अंक वाले आगे आने लगे और Government Job पाने लगे ।

कडी मेहनत और नियमित परिश्रम से RAS Exam मे अच्छे अंक प्राप्त करने के बाद भी Selection नही हुआ और वर्माजी का आरक्षण ( Reservation ) की वजह से कम नंबर आने के बाद भी सलेक्शन हो गया।
योग्यता होने के बावजूद वे सिर्फ एक सरकारी बाबू बन कर रह गए । और कई सालो से प्रमोशन नही हुआ लेकिन वर्माजी Promotion से कलेक्टर बन गये ।

अखबार मे छपी अपने बचपन के दोस्त की Photo देखकर मन ही मन खुश हो रहे थे कि   उनका Friends आज बडी पोस्ट पर पहूँच गया ।
लेकिन एक ओर यह सोच कर दुखी हो रहे थे कि इस देश का क्या हाल होगा ?

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  कहानी कुत्ते की सभा - आरक्षण


जब कम नंबर वाले अफसर बन रहे है और ज्यादा नंबर वाले बेरोजगार घुम रहे है।
जहाँ देखो वहा Reservation का ही बोलबाला है।  सिंह साहब मन ही मन इस व्यवस्था को कोसने लगे ।
फोन की घंटी के साथ ही स्मृति से बाहर आए और Phone Received किया " हैलो "
' हैलो, पापा मै बोर्ड परीक्षा मे जिले मे प्रथम स्थान पर आया हूँ '  सिंह साहब के बड़े बेटे हनी ने उत्साह के साथ जानकारी दी ।
' बहुत अच्छा, शाबास बेटा' कहकर सिंह साहब ने फोन काट दिया ।

मन ही मन कहने लगे ' बेटा मै जानता हूँ मै आरक्षण का भुक्तभोगी हू मुझे पता है कि क्या फायदा मेरिट मे आने का । आरक्षण प्रतिभा को दबा देगा कभी आगे बढने नही देगा और बेटा तुम्हे इसका आभास हो जाएगा ।
खैर जो होगा देखा जायेगा  । बेटा तुम Success हो और आशा करूगा की तुम "आरक्षण के भुक्तभोगी " न बनो ।
दिल से बेटे को दुआ देते हुए सिंह साहब फाइलों के साथ माथापच्ची करने लगे ।


दोस्तो आपको हमारी यह " आरक्षण का भुक्तभोगी" कहानी कैसी लगी और आपके आरक्षण पर क्या विचार है comments box मे जरूर बताय और यदि अच्छी लगे तो अपने दोस्तो के साथ जरूर share करे ।


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कहानी - कुत्ते की सभा | story of democracy and reservation in forest


   कुत्ते की सभा :- जंगल मे लोकतंत्र और आरक्षण



आज जंगल मे बहुत चहल-पहल है । सभी जानवर जंगल के बीच मे बने कुएँ की तरफ अपने अपने परिवार के साथ तेज कदमो के साथ जा रहे थे ।
गोलू बंदर पेड़ो पर छलाँगे मारते हुए अपने परिवार के साथ तेजी से कुएँ के पास जाने की कोशिश कर रहा था । मोटू हाथी भी अपनी सुन्ड से रास्ते मे आ रही पेड़ो की टहनियों को तोड़ता हुआ कुएँ की ओर जा रहा था ।
गणेशजी का वाहन मूषक महाराज भी गणेशजी को बीच रास्ते मे ही छोड़ कुएँ की ओर जा रहे थे ।
इस प्रकार सभी जानवर कुत्ते के द्वारा आयोजित सभा मे भाग लेने के लिए सह परिवार कुएँ पर जा रहे थे ।

कहानी  अपाहिज कौन  | story apahij koun 

जंगल के सभी जानवर कुएँ के पास एकत्रित हो गए ।
जंगल के राजा शेर भी साथी जानवरो के कहने पर मिटिंग मे आए । सभी जानवर आपस मे कानाफूसी कर रहे थे कि आखिर यह सभा आयोजित क्यो की गयी है ।

जानवरो की उत्सुकता देखते हुए सभा के संचालक वैशाखनन्दन जी ने आगे आकर कहा - " मेरे जंगलवासी भाइयो आप जानते है कि जंगल मे कोई कानून नही है । शेर सदियो से हमारा राजा बना हुआ है । भाइयो आज मिटिंग इसलिए आयोजित की गई है जंगल की व्यवस्था को कैसे बदली जाए  और जंगल मे भी लोकतंत्र और आरक्षण लाए । "

इसलिए इस मुद्दे पर अधिक जानकारी के लिए हमारे बीच अभी अभी शहर से आए टाॅमी (कुत्ता ) जी है जो आपको इंसानो के शहर के बारे मे बतायेंगे ।

story on reservation


निमंत्रण पाकर टाई सूट पहने टाॅमी कुत्ते ने अपना भाषण शुरू किया - भाइयो आप यहा पर सदियो से अन्याय सहते आ रहे हो । भाइयो अब समय आ गया है हमे आवाज उठानी होगी । शहर मे कमजोरो को आगे लाने  की एक व्यवस्था है जिसे वहा आरक्षण कहते है । हमे भी ऐसी व्यवस्था जंगल मे लानी होगी । इसके लिए मुझे आपके साथ की जरूरत है आपकी की क्या राय है ?"

कुत्ते का भाषण सुन हिरण ने कहा - यह व्यवस्था इंसानो को अपनाने दो हमे इसकी आवश्यकता नही है । यह जंगल है इंसानो का शहर नही । यहा रेश मे घोड़ों के पांव मे जंजीर डालकर गधों को नही जिताया जाता ।"
सभी जानवरो ने ताली बजाकर हिरण की बात का समर्थन किया ।

कुत्ते ने समझाते हुए कहा -" तुम सब लोग अनपढ़ और गंवार हो इसलिए ऐसा  कह रहे हो । हमे इंसान से सीखना चाहिए , उन्होंने अपनी बुद्धि के बल पर कितनी तकनीक विकसित की है ।

मोटू हाथी ने चिंघाड़ मारते हुए जवाब दिया -" जो आरक्षण के लिए बहन बेटी की इज्जत तार तार करे , सड़क तोड़े , अपने ही देश को अपमानित करे ऐसे इंसानो से हम क्या सीखे ? जो कभी आपस मे प्यार से नही रह सकते , कभी धर्म के नाम और कभी राष्ट्र के नाम आपस मे लड़ते रहते है उस इंसान से क्या सीखे ? 
जो अपनी उच्च संस्कृति को छोड़ कर निम्न संस्कृति को अपनाए ऐसे इंसानो से हम क्या सीखे ? बताओ क्या सीखे हम ? 
हाथी का जवाब सुनकर कुत्ता बगले झांकने लगा ।

सभी जानवरो के जवाब सुनकर जंगल के राजा शेर ने कुत्ते से कहा कि तुम हमे इंसान के जैसा बनाने की कोशिश मत करना ।हम जंगली सही है । हम इंसानो की तरह आपस मे झगड़ते नही है । यहाँ सड़को पर कलियाँ नही मचली जाती  । यहा वृद्धो के लिए वृद्धाश्रम नही बनाय जाते । यहा पर राजनीति के नाम पर आपस मे नही लड़ते । 
तुम यहा से चले जाओ कही तुम पवित्र जंगल को भी इंसानो का शहर न बना दो । 


                      लेखक :- विरम सिंह सुरावा

गुरु शिष्य की कहानी
आरक्षण पर निबंध
आरक्षण पर कहानी

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Guru shishy ki kahani | short moral story in hindi

 

Best motivational stories


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 yh bat us time ki hai jb school nahi hua karte the. Or study ke lie gurukul hote the. Study ke lie savsabhi ko gurukul me hi rahna hota tha.

us time sadhu mahatma hi sabhi ko education  dete the. Vidya prapti ke bad jb kisi student ki education  puri ho jati tgthi to guru usko ek last shiksha dete the, jo uske jiwan se jiwan se judi hoti thi.

Ese aashrm me padhai krne vale ek yuvak ki shiksha puri hui to guru ne use sikh dene ki lie apne pas bulaya.

or guru apna munh kholte hai or shishy ko munh me dekhne ka kahte hai.

student ko bahut tajjub hua ki guru ne esa kyo kaha hai. Prntu guru ki aagya ko mankr unke munh me dekhne lga.

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guru shishy se swal puchhte h ki mere munh me kya dikhai diya?

Shishy kahta hai-"guruji apke munh me to kewal juban hi hai dant to hai hi nahi.

Guruji ne muskurate hue kaha ki -"jb mera jnm hua tb bhi juban mere munh me thi or dant 2 sal bad men aae the. Lekin to bhi dant pahle sath chhod gae. "

Shishy ne kaha yh bat to sahi hai, lekin esa kyon?

Guru ne kaha -"vts dant kathor the or juban mulaym . Dant apni kathorta ke karan jldi tut gae or juban apni mulaymta ke karan avhi tk mere sath hai."

"Ji Guruji"

Guru ne kaha -" vts isse yh shiksha milti hai ki hm jitne kathor rahenge utne jldi tod die jaoge or jitne nmr rahoge itna jyada aage tk jaoge.

Shishy ne Guruji ki bat ko apne mn me utar kar vah apne ghar ki or rwana ho gya.


शिक्षा - इससे हमे यह सीखना चाहिए कि हमे अपनी life मे कठोर नही होना चाहिए । बल्कि सबके साथ नम्रता से बात करनी चाहिए । कठोरता से दोस्त की जगह दुश्मन ज्यादा बनते है ।