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SC ST Act क्या है? और क्यों बनाया गया? हरिजन एक्ट की सजा ...


Scheduled Castes and Tribes (Prevention of Atrocities) Act, 1989

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति ( अत्याचार ) निरोधक अधिनियम, 1989

sc st act in hindi 

SC ST Act कब आया ?

  अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम को राजीव गाँधी की सरकार ने 11 सितम्बर 1989 को संसद में पेश किया था. उस समय कांग्रेस के पास भारी बहुमत था इसलिए यह बिल उसी दिन पारित हो गया.

SC ST बिल को संसद द्वारा पारित किए जाने के बाद इस पर 30 जनवरी, 1990 को राष्ट्रपति ने मुहर लगा दी और इसके बाद यह अधिनियम जम्मू कश्मीर को छोड़ कर पुरे भारत में लागु हो गया.

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SC ST Act क्यों बनाया गया?

   जब संसद में इस को पेश किया गया तब कहा गया था कि आजादी के बाद भी दलितों की स्थिति में कोई खास बदलाव नही आया है. आज भी SC ST के लोगो को दबाया जाता है और उन्हें अपमानित किया जाता है.

इन के साथ होने वाले अन्याय को परिभाषित नहीं किया जा रहा है और प्रभावशाली लोग अपने प्रभाव से हर उठने वाली आवाज को दबा देते है.
भारतीय दंड संहिता (IPC) और सिविल राइट एक्ट 1955 अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगो को न्याय दिलाने में कमजोर पड रहे है. 

 इस कारण एसी एसटी के लोगो को न्याय दिलाने के लिए एक ऐसे कानून की जरूरत थी जो उन्हें अत्याचर से लड़ने में help कर सके. इन सभी बातों का हवाला देते हुए इस एक्ट को बनाया गया था.

SC ST Act किस पर लागु होता है ?

  SC ST Act उन सभी लोगो पर लागु होता है जो sc st cast से belong नहीं करते है. यह एक्ट अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगो पर होने वाले अपराधों से रक्षा करता है.
इस act में 5 अध्याय और 23 धाराएँ है .

इस एक्ट के तहत यदि किसी sc st के व्यक्ति पर कोई upper cast का व्यक्ति अपराध करता है तो उस व्यक्ति पर IPC की धारा तो लगेगी परन्तु साथ ही sc st act की धारा भी लगेगी.


किस अपराध पर SC ST एक्ट लागु होता है?

 यदि कोई गैर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का व्यक्ति sc st के व्यक्ति के खिलाफ निम्न मेसे यदि कोई भी अपराध करता है तो यह एक्ट प्रभावी होता है-

⦁    यदि किसी SC ST के व्यक्ति के साथ  व्यापार करने से इंकार करता है.

⦁    यदि SC ST के व्यक्ति को नौकरी देने से इंकार करना.

⦁    अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगो को जबरन मलमूत्र खिलाना या अपमानित करना.

⦁    उन्हें किसी सार्वजनिक जगह पर जाने से रोकना.

⦁    SC ST के व्यक्ति का सामाजिक बहिष्कार करना.

⦁    एससी एसटी  के व्यक्ति के साथ मारपीट करना या परिवार के सामने अपमानित करना.

⦁    अनुसूचित जाति और जनजाति के व्यक्ति के जबरन कपड़े उतारना और नंगा करके सार्वजनिक स्थल पर घुमाना.

⦁    इनके चेहरे पर कालिख लगाना या paint करना.

⦁    इस केटेगरी के लोगो को जबरन घर से निकालना या घर छोड़ने के लिए मजबूर करना.

⦁    अनुसूचित जाति और जनजाति के व्यक्ति के खिलाफ झूठा आरोप लगाना .

⦁    SC ST की महिला को अपमानित करना या उसका यौन शोषण करना.

⦁    SC ST के व्यक्ति को किसी विशेष व्यक्ति को vote देने के लिए मजबूर करना.

⦁    अनुसूचित जाती और अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति की भूमि पर जबरन कब्जा करना.

यदि इनमेंसे कोई अपराध किया जाता है तो उस पर SC ST Act, 1989 लागु होता है.

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अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति एक्ट में सजा क्या होती है?


⦁    यदि किसी व्यक्ति पर इस एक्ट के तहत केस दर्ज होता है तो उसकी तुरंत गिरफ्तारी की जाती है और उसे अग्रिम जमानत भी नहीं मिलती है.

⦁    पकडे जाने के बाद भी व्यक्ति को केवल high court ही जमानत दे सकता है.

⦁    sc st एक्ट के मामलो की सुनवाई एक विशेष अदालत करती है जो SC ST Act की धारा 14 के तहत बनाई गयी है.

⦁    व्यक्ति को IPC की सजा के अतिरिक्त इस एक्ट के तहत 6 महीने से लेकर उम्रकैद की सजा हो सकती है.

⦁    यदि केस किसी सरकारी अधिकारी के खिलाफ है तो उसे तब ही दर्ज किया जा सकता है जब वो जाँच में दोषी पाया जाता है.


इस प्रकार अनुसूचित जाति और जनजाति अधिनियम के तहत सजा होती है. लेकिन इस एक्ट के तहत तुरंत गिरफ्तारी होती है और जमानत भी नहीं मिलती इस कारण से कुछ लोग इसका दुरूपयोग भी करने लगे है.

किसी व्यक्ति या अपने साथी कर्मचारी से किसी दुश्मनी के कारण उसे इस एक्ट के तहत फसाया जाता है जिससे इस act का misuse होता है.

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट की मुताबिक 2016 में कुल 11060 केस दर्ज हुए जिनमेंसे 935 केस फर्जी निकले. अर्थात लगभग 10% और 2015 में लगभग 15% केस फर्जी पाए गये थे.

इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस एक्ट को उदार बनाने की पहल की है.

SC ST Act में सुप्रीम कोर्ट ने क्या बदलाव किए?

 Note- सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला बदल दिया है। जो बदलाव किए थे उन्हें सही नही माना है।


  आम जानकारी के लिए की पहले कोर्ट ने क्या कहा था उसके लिए आप इन पॉइंट्स को पढ़ सकते है...

⦁    सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा है कि sc st act के मामलो की जाँच डिप्टी sp रैंक के अधिकारी करेंगे. पहले इन मामलो की जाँच इंस्पेक्टर करता था.

⦁    किसी भी सरकारी अधिकारी को तुरंत गिरफ्तार नहीं किया जाएगा.

⦁    किसी आम आदमी को भी तुरंत पकड़ा नहीं जाएगा उसको गिरफ्तार करने के लिए sp या एसएसपी से अनुमति लेनी होगी.

⦁    किसी भी व्यक्ति को अग्रिम जमानत दी जा सकती है और जमानत देने के अधिकार मजिस्ट्रेट के पास होगा. पहले केवल हाई कोर्ट ही जमानत दे सकता था.


सुप्रीम कोर्ट के दो जजों ने यह फैसला सुनाया है.



सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कुछ लोगो का कहना है की इससे sc st के लोगो के खिलाफ अपराध बढ़ेंगे क्योंकि यदि डिप्टी रैंक का अधिकारी जाँच करेगा तब तक प्रभावशाली लोग अपनी ताकत से मामले को दबा देंगे.

और साथ ही कुछ लोगो का कहना है की ससे फर्जी केसों में कमी आएगी और राजनैतिक दुश्मनी निकलने के लिए जो केस किए जाते थे उनमे कमी आएगी. जिससे किसी बेगुनाह को अपमानित अन्हीं होना पड़ेगा.

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दोस्तों आपको हमारा यह लेख "अनुसूचित जाती और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम, 1989 क्या है ? और यह कैसे कार्य करता है?" कैसा लगा ?आप कमेंट्स में जरुर बताए और यदि इस पोस्ट से जुडी और कोई जानकारी हो तो हमारे साथ जरुर share करे.

यादें 35 नंबर की .... best hindi emotional story

Heart Touching Story  in hindi



लम्बे वक्त तक साथ रहने के बाद एकाएक बिछुड़ना कठिन होता है.. मन को समझान पड़ता है.. जिस जगह पर रहे है उसका हर कोना कुछ न कुछ याद दिला जाता है ... मैने भी 3 घंटे अकेले ऐसे ही सवाल पूछते कमरे में बिताये.... इस से अधिक मैं वहाँ रुक न सका... 

heart touching story

Yaden Room  Number 35 Ki


याद जब आती है तो मेलें में अकेला कर जाती है, हजारों के पास होने पर भी किसी के न होने का अहसास दिला जाती है.. जिस स्थान से जो यादें जुडी होती है वो जगह हर क्षण गुजरे कल के उन पलों की याद दिलाती है.. उनसे जुडी हर वस्तु उनके पास न होने पर भी पास होने का अहसास दिला अकेलापन महसूस करा देती है...

 ऐसी ही कुछ यादें जुडी हुई है 35 नंबर के साथ... वैसे 35 नंबर न कोई lucky नंबर है और न ही किसी महबूबा के मकान का नंबर है .. उदयपुर में फतेहसागर झील जहाँ कितने ही  मजनूं अपनी लैला की तलाश में शाम के समय भँवरे की भांति मंडराते है .. किसी को तो कली मिल जाती है तो किसी को मुरझाएं हुए फूल से ही संतोष करना पड़ता है...

उसी झील से थोड़े से फासले पर स्थित विद्या भवन के जुबली हॉस्टल के प्रथम तले का कमरा, जिसे सब रूम नंबर 35 के नाम से जानते है. कॉलेज जीवन के सबसे यादगार पल हॉस्टल के ही होते है और ऐसी ही कुछ यादें इस कमरे के साथ जुडी हुई है...

पिछले दो बसंत से यह कमरा अपने बाशिंदों की चहलपहल से आबाद रहा..वैसे तो इस कमरे पहले भी कई मुसाफिर रह चुके है परन्तु हम जैसा कोई राहगीर नहीं मिला होगा...


मिलकर किसी को रुलाना, फिर रोते को हंसाना;
हो चाहें ख़ुशी या गम हर पल को साथ में जीना...


यही विशेषताएँ यहाँ के बाशिंदों को ओरों से अलग करती थी....

कॉलेज खत्म होने के बाद सब साथी अपने अपने गाँव की ओर प्रस्थान कर चुके थे.. लेकिन मैं पहले ही यहाँ रहने का निश्चिय कर चूका था मगर मुझे अपना निश्चिय इतना जल्दी बदलना पड़ेगा, मुझे भी पता नहीं था.. वैसे भी भविष्य को किसने देखा है जब होता है तब ही पता लगता है की क्या होने वाला था, और कभी कभी तो होने के बाद ही पता चलता है...

सभी को विदा करने के बाद पीछे रह गये थे मै और 35 नंबर वाला कमरा...जो अपने में २ बसंत की यादों को समेटे किसी के होने का अहसास दिलाता था...सभी को विदा  करने के बाद कमरे में आकर लेट गया और अपने में ही खो गया... तभी लगा कोई बरामदे में टहलते हुए जोर जोर से गा रहा है-

"बन्ना थारे धुंधलियाँ धोरां में
  म्हारी चलती मोटर थाकी....."


गीत के बोल रिपीट हो रहे थे और आवाज तेज हो रही थी...उसने गाना बंद किया और कहने लगा -'बाबु....ऐ बाबु... बाबु.....उठ जा बाबु... '

'जसवीरसा!' मैने जोर से पुकारा, सामने से कोई जवाब नहीं आया...

अपने आप को सम्भालते हुए उठ बैठा और अपने आसपास देखा तो पाया की कमरे में तो अकेला ही हूँ ऊपर छत पर लगा पंखा धीमी गति से घूम रहा था और मच्छर भिनभिना रहे थे..खिड़कियाँ बंद थी और कुर्सियां किसी के बैठने के इंतजार में पलक पावड़े बिछाए खड़ी थी...

अभी उठ कर अंगड़ाई ही ली थी कि लगा कोई कह रहा है-'जरा धीरे से, आवाज मत करों, जसवीरसा पढ़ रहे है... पलट कर देखा तो वहाँ कोई नहीं था..

दरवाज़ा, खिड़कियाँ, टेबल, कुर्सियाँ सबको देख ऐसा लग रहा थी की यह कुछ कहना चाहते है... जब हम अकेले होते है तो हवाएँ भी बातें करती है, खिड़कियाँ किसी की याद दिलाती है, पंखा भी बतियाता है बस जरूरत होती है तो सुनने वाले की .... आज  अकेला था  मुझे भी किसी की जरूरत थी और उन्हें भी किसी की जरूरत थी...


इस बात को समझते हुए दरवाजे के पास वाली टेबल बतियाने लगी -'  मुसाफिर! कहाँ गये तेरे वो हमराही....? कहाँ गया वो आशिक दीवाना...? जिसके हाथो के प्रहारों  को मैने कई बार झेले है...जब वो रात रात भर जागता
था तब मैने उसे अपनी गोद में सुलाया है... बताओं कहाँ गया वो...?

पर मैं चुप था....

बिना उत्तर की प्रतीक्षा किए उसने पुछना जारी  रखा ....'सब के सुख दुःख का साथी; सैकड़ों दिलों का राजा... अपने अंदर रहस्यों का समन्दर रखने वाला वो बाशिंदा कहाँ गया,,,?'

'किसी को हंसाने से पहले खुद ही हंस जाता, जब हंसता तो खुद को ही नहीं सम्भाल पाता.... हँसना - हँसाना ही उसका काम था वो गोल-मटोल , जोली कहाँ गया?'

लेकिन मैं फिर भी चुप था.... बोलकर क्या बताता की अब तेरे बाशिंदे नये ठिकाने पर चले गये है तो उसे कितना दुःख होता,,,,,

लेकिन वे अब भी कातर दृष्टि से मुझे देख रहे थे जैसे अब मेरे होठ खुलंगे और जवाब देंगे... पर मै तो खुद ही अकेला था... क्या करता... जब उनकी दृष्टि मुझ पर से नहीं  हटी तो मैने अपनी आँखे बंद कर ली...

परन्तु जिस प्रकार पानी देखने से प्यास नहीं बूझ सकती उसी प्रकार आँखे बंद कर लेने से सामने जलती आग नहीं बूझ सकती... लेकिन ओर करता भी क्या?

जब भी कमरे से ध्यान हटाने की कोशिश करता तो लगता कोई गा रहा है -
:
 "ओ फिरकी वाली तू कल फिर आना
नही फिर जाना तू अपनी ज़ुबान से
के तेरी नैना है शराब बेईमान से
ओ मतवाली यह दिल क्यूँ तोड़ा
यह तीर काहे छ्चोड़ आ नज़र की कमान से
के मार जायुंगा मैं बस मुस्कान से "

पर आखों के आगे तो सब सुना सुना था न कोई फिरकी वाली थी न ही कोई साथी  था....

तभी सोचा उठ कर कुछ खा लूँ पर याद आया गुड-चने रखने वाला तो अब यहाँ नहीं है फिर भी मन कठोर कर हल्के हाथो से अलमारी को खोला...तो सामने का नज़ारा देख हक्का बक्का रह गया.. अंदर कुछ मच्छर खो-खो खेल रहे थे दोएक ने तो मुझे विपक्षी टीम का समझकर आउट कर दिया... मैने भी उनके खेल में दखल नहीं देते हुए अलमारी को जैसे खोली थी ऐसे ही बंद कर दी....

मन बहलाने के लिए उठ कर बरामदे में आ गया परन्तु यहाँ भी एकांत था.. जो कभी मुझे पसंद था लेकिन आज विष बाण की भांति चुभ रहा था... थोडा टहल कर पुन: कमरे में आ गया...


पंखा अब भी धीमी गति से चल रहा था और मैने भी उसे तेज़ करने की कोशिश नहीं की, पलंग पर बिस्तर आधा समेटा पड़ा था...दिवार वाले हेंगर पर एक आधा  काला आधा सफेद  पेंट लटक रहा था जो अपने पर गिरती पपड़ी से असली रंग के अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है, पास में ही लटकता मटमैला कमीज जिसमे से झांकते कुछ सफेद बिंदु कमीज के कभी सफ़ेद होने का अहसास दिला रहे थे...
 

इन सब के अलावा कमरे में मैं और अलमारी में वो खो खो खेलते मच्छर थे...

इस अनचाहे एकांत में जो लम्हे याद आ रहे थे वो किसी पत्थर को भी पिघला सकते थे ...लेकिन अब वो सब कहाँ जो हमने साथ में बिताया.....


 रात-रात भर चलती बातें
जाग कर बिताई वो रातें
कभी अपना, कभी उसका हाल सुनाते
कुछ अपनी, कुछ उनकी सुनते-सुनाते
साथ गाते, साथ पीते
हर पल को साथ ही जीते ...
     
उन साथ बिताएं लम्हों की यादे तीर की भांति दिल को चुभ रही है पर नम आंखे हो रही है...
वैसे तो कुछ बसंत का साथ था अपना पर लगता है जैसे युगों युगों के हमराही आज बिछुड़ गये हो...
अब 35 नंबर की प्रत्येक वस्तु सवाल कर रही है... बीते पलों को याद दिला रही है... इन सब के बीच अकेले रहना बहुत मुश्किल हो रहा है इसलिए अपने निश्चिय को बदलकर रूम नंबर  35 को अलविदा कह रहा हूँ...

 यह कमरा अब अकेला हो जायेगा और इंतजार करेगा अपने नये बाशिंदों का ताकि उन्हें वो अपने  सिरफिरे, अलबेले बाशिंदों की कहानी सुना सके.... अपना दर्द बयाँ कर सके....


viram singh story

विरम सिंह देवड़ा 


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आरक्षण का भुक्तभोगी हिन्दी कहानी story on reservation


Story On Reservation Policy

हिन्दी कहानी " आरक्षण का भुक्तभोगी  "

'Good Morning Sir ' चपरासी ने विनम्रता के साथ  Files को Set कर रहे बड़े साहब का अभिवादन किया ।
'Good Morning , और रामलाल क्या हालचाल है? ' अपनी नजर उठाये बिना ही सिंह साहब ने पूछा ।
'सब ठीक है साहब! हमारे जिले के कलेक्टर साहब Transfer हो गया है ।'  रामलाल ने जानकारी देते हुए कहा ।
' क्या? कौन आया है अब उनकी जगह ' सिंह साहब ने आश्चर्य से पूछा ।
' कोई वर्माजी है साहब । '

reservation


'अच्छा ठीक है तुम जाओ और सुनो आज का अखबार चेम्बर मे पहुंचा देना ।' सिंह साहब ने आदेश देते हुए कहा ।
'जी साहब '
सिंह साहब अपने काम मे Busy हो गये और Table पर बिखरी फाइलों को निपटाने लगे।
इतने मे रामलाल अखबार लेकर आ गया और  पेपर Table पर रख कर चला गया ।

सिंह साहब फाइलों के ढेर से अपने आप को बाहर निकाल कर अखबार पढने लगे ।
' अरे यह क्या ? इसे तो मै जानता हूँ ।' अखबार मे छपी Photo देखकर मन ही मन कहा ।

स्मृति पटल पर पुराने दृश्य उभर कर सामने आने लगे । बचपन मे हम दोनो साथ ही पढते थे और हमेशा साथ साथ स्कूल जाते थे । हम दोनो के हालात एक जैसे ही थे । पर वर्माजी की जाति आरक्षण पाने वाली मे से थी इसलिए उसे Government की तरफ से Help भी मिलती थी। लेकिन मुझे कुछ नही मिलता था क्योंकि मे General Category से था ।

12 वी की परीक्षा First Division से Pass करने के बावजूद शहर की College मे प्रवेश नही मिला । जबकि वर्माजी के काम Marks के बावजूद selection हो गया ।

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उस वक्त मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ ऐसा क्यो?
तब मेरा आरक्षण से पहली बार सामना हुआ   । उसके बाद तो यह सिलसिला चलता ही रहा । अच्छे Marks आने के बावजूद भी न कोई Government की तरफ से छात्रवृति मिलती और न कोई सरकारी नौकरी मे फायदा मिलता । लेकिन आरक्षण से कम अंक वाले आगे आने लगे और Government Job पाने लगे ।

कडी मेहनत और नियमित परिश्रम से RAS Exam मे अच्छे अंक प्राप्त करने के बाद भी Selection नही हुआ और वर्माजी का आरक्षण ( Reservation ) की वजह से कम नंबर आने के बाद भी सलेक्शन हो गया।
योग्यता होने के बावजूद वे सिर्फ एक सरकारी बाबू बन कर रह गए । और कई सालो से प्रमोशन नही हुआ लेकिन वर्माजी Promotion से कलेक्टर बन गये ।

अखबार मे छपी अपने बचपन के दोस्त की Photo देखकर मन ही मन खुश हो रहे थे कि   उनका Friends आज बडी पोस्ट पर पहूँच गया ।
लेकिन एक ओर यह सोच कर दुखी हो रहे थे कि इस देश का क्या हाल होगा ?

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जब कम नंबर वाले अफसर बन रहे है और ज्यादा नंबर वाले बेरोजगार घुम रहे है।
जहाँ देखो वहा Reservation का ही बोलबाला है।  सिंह साहब मन ही मन इस व्यवस्था को कोसने लगे ।
फोन की घंटी के साथ ही स्मृति से बाहर आए और Phone Received किया " हैलो "
' हैलो, पापा मै बोर्ड परीक्षा मे जिले मे प्रथम स्थान पर आया हूँ '  सिंह साहब के बड़े बेटे हनी ने उत्साह के साथ जानकारी दी ।
' बहुत अच्छा, शाबास बेटा' कहकर सिंह साहब ने फोन काट दिया ।

मन ही मन कहने लगे ' बेटा मै जानता हूँ मै आरक्षण का भुक्तभोगी हू मुझे पता है कि क्या फायदा मेरिट मे आने का । आरक्षण प्रतिभा को दबा देगा कभी आगे बढने नही देगा और बेटा तुम्हे इसका आभास हो जाएगा ।
खैर जो होगा देखा जायेगा  । बेटा तुम Success हो और आशा करूगा की तुम "आरक्षण के भुक्तभोगी " न बनो ।
दिल से बेटे को दुआ देते हुए सिंह साहब फाइलों के साथ माथापच्ची करने लगे ।


दोस्तो आपको हमारी यह " आरक्षण का भुक्तभोगी" कहानी कैसी लगी और आपके आरक्षण पर क्या विचार है comments box मे जरूर बताय और यदि अच्छी लगे तो अपने दोस्तो के साथ जरूर share करे ।


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कठुआ रेप केस क्या है? Rape क्यों हो रहे है और जिम्मेदार कौन है?

What is  Kathua Rape and murder Case


दोस्तों भारत एक ऐसा देश है जिसमे नारी को देवी का रूप माना जाता है. और भगवान से बढ़कर महिलाओं को सम्मान दिया जाता रहा है. परन्तु आज समाज में कुछ ऐसे लोग आ गये है जिन्होंने इंसानियत को शर्मसार कर दिया है.


जिस देश को देवी का स्वरूप मानते है उसमे बलात्कार जैसे घिनौने कार्यों को अंजाम दिया जा रहा है और यह भेडिये मासूम कलियों को भी नहीं बक्श रहे है.

अभी हाल में जम्मू&कश्मीर से एक मामला सामने आया है जिसमे एक आठ साल की मासूम के साथ 6 लोगों ने लगभग आठ दिनों तक घिनौना काम किया . आज मे इस पोस्ट में इसी को लेकर बताने वाला हूँ कि पूरा मामला क्या है? अपराधी कौन है? और इस सबके लिए जिम्मेदार कौन है?

rape case in hindi

what is the case? कठुआ रेप केस क्या है?

 यह पूरा मामला 17 जनवरी 2018 को सामने आया जब एक आठ साल की बच्ची के शव को पुलिस ने बरामद किया. जिसमे बाद में पता चला की यह body आसिफा की है जो की 10 जनवरी 2018 लापता हो गई थी.
डॉक्टर्स की रिपोर्ट के अनुसार बच्ची के सामूहिक रूप से rape किया गया और इसको आठ दिनों तक भूखा रखा गया. इसके साथ ही बच्ची को नशीली दवाईयाँ भी दी जाती थी जिससे लड़की शांत रहे और मामला सामने न आये.

इस सब काण्ड के पीछे mastermind सांझी राम है और उसके साथ उसका पुत्र विशाल, उसका भतीजा, परवेश वर्मा और दो पुलिस officers - दीपक खजुरिया और सुरेंदर कुमार. और इस केस के सबूतों को मिटाने में हेड कांस्टेबल तिलक राज और सब इंस्पेक्टर  आनंद दत्ता ने भूमिका निभाई.  इन सभी आठ लोगों को अब पुलिस गिरफ्तार कर लिया है.

बच्ची को अगवा करने में सांझी राम के नाबालिक भानजे ने अहम भूमिका निभाई और इसी ने अपने ममेरे भाई विशाल को मेरठ से फ़ोन पर यह कहा  की "तुम भी आ जाओ, अपनी हवस को शांत करने." जम्मू बुलाया और उन्होंने बच्ची के साथ rape किया .

इस पुरे काण्ड के बारे में सोचकर ही हृदय दहल जाता है और इसके बारे में लिखना भी बहुत मुश्किल है . इन लोगों ने मानवता को ताक पर रख कर कुत्तो की तरह बच्ची को आठ दिनों तक नोचा.

जब यह लोग बच्ची को मारने जा रहे थे तो पुलिस ऑफिसर्स दीपक खजुरिया ने कहा -"रुको, मे अभी एक बार ओर इसके साथ rape करना चाहता हूँ." और फिर इन लोगों ने अपनी हवस को शांत किया. आप इस बात से अनुमान लगा सकते है कि इन लोगो की कैसी मानसिकता रही होगी. 
इन हैवानो ने फिर उस को पत्थरों से उसकी हत्या कर दी.

नारी देवी तो देवी का अपमान क्यों
तो जिन्दा हो तुम

मामले को धार्मिक रूप देना

        इस मामले के सामने आते ही राजनैतिक लोग अपनी रोटियां सेकने के लिए पुरे काण्ड को धार्मिक रूप देने में लग गये. लेकिन यह बात समझना बहुत जरुरी है कि "बेटी तो बेटी होती है फिर चाहे वो हिन्दू की हो या मुसलमान की."

आसिफा मुस्लिम फैमिली से है पर वो तो आठ साल की थी उसे तो न अपने दाएं -बाएँ हाथ का पता था न ही धर्म का पता था. उस मासूम के साथ जो हुआ उससे ज्यादा घिनौना कार्य कुछ भी नहीं हो सकता.


जिम्मेदार कौन ?

  देश में आये दिन ऐसे कांड सामने आते है और कुछ दिनों के बाद उसे भुला दिया जाता है. कुछ सालों पहले 16 दिसम्बर की रात को भी ऐसा ही घिनौना कार्य हुआ था उसके बाद लोग सडको पर भी आये नये कानून भी बने लेकिन हुआ क्या? न rape होने बंद हुए और न ही ऐसी घटना को राजनैतिक रूप देना बंद हुआ.

इस केस में पुलिस की भी भूमिका थी तो जब रक्षक ही भक्षक बन जाए तो लोग किसके पास जाए. अब पूरी घटना के होने के बाद कई लोग इन अपराधियों के पक्ष में रैली निकालने और धरना प्रदर्शनकरने लगे है जो की ऐसे लोगो को बढ़ावा देते है.

जब तक ऐसे लोगो की मानसिकता में बदलाव  नहीं क्या जाता तब तक कानून बदलने से या रैली निकालने से कुछ ज्यादा इफेक्ट्स नहीं पड़ेगा. इसलिए "सोच बदलो देश बदलेगा."

issues क्या सामने आते है?

  मानवता ( humanity )- क्या भारत जैसे देश जिसे विश्व गुरु कहा जाता थ उसमे ऐसे मानवता को शर्मसार करने वाले काम हो रहे है.  लोगो की मानसिकता इतनी विकृत हो गई है जिसमे बदला लेने के लिए मासूमों को शिकार बनाया जा रहा है.

जिस देश में दुर्गादास राठौड़ जैसे लोग हुए है जिन्होंने अपने कट्टर दुश्मनों की सन्तान हाथ लगने पर भी उन के साथ अपने बेटे-बेटी की तरह पाल पोश  कर  बड़ा किया और सम्मान के साथ उनके राज्य में भेज दिया.

politics - पुरे मामले में नेता और अफसर की बड़ी भूमिका रही जहाँ अफसरों ने घटना को अंजाम दिया वही नेताओं ने उन्हें बचने के लिए रैली में भाग लिया .

सामाजिक सौहार्द को बिगाड़ना  - ऐसे कृत्य करने वाले किसी भी मजहब के हो लेकिन इतना तो पक्का है की उन्हें अपने मजहब का ज्ञान नहीं है क्योंकि कोई भी मजहब ऐसे कांड को कतई सही नहीं कह सकता . यह काम एक विकृत और घटिया सोच का व्यक्ति ही कर सकता है .

महाराणा प्रताप की जीवनी

कठुआ rape case में क्या हो?

  ऐसे मामलों में इन लोगों को फांसी से कम सजा तो हो ही नहीं सकती और यह तो मानवता और भारतीय संस्कृति को निचा दिखाने वाला कार्य है.

कई लोग इस पुरे मामले को धार्मिक रूप देकर चुपी साध रहे है मेरा तो इतना ही कहना है -
   "मेरे कत्ल पर हंसने वालो, कल आपका भी नंबर आएगा."

और इस पुरे घटना पर मुझे मेरी दो लाइन है -
   जहाँ सोना ला रही है बेटियां खेलों में,
  वहां कलियाँ नोची जा रही है गलियों में.
#JusticeforAsifa आप हमारे फेसबुक page पर भी जुड़ सकते है .



इच्छा मृत्यु कानून क्या है?
sc st act क्या है?


आपके इस case पर क्या ख्याल है और आपके अनुसार इस सबके लिए कौन जिम्मेदार है? तथा इन्हें क्या सजा दी जानी चाहिए? एस पर अपने विचार जरुर लिखे. क्योंकि यदि आज आप चुप रहे तो भावी पीढ़ी आपसे जवाब मांगेगी.

माँ का ख़त बेटे के नाम

दोस्तो एक बुढ़ी माँ परदेश मे बस गए अपने लाडले बेटे को खत लिखती है । और उसे घर के हालात और अपनी व्यथा की दुहाई देकर एक बार घर आने का आग्रह करती है । आप के दिल को छू जाने वाला "माँ का खत बेटे के नाम "

maa ka khat


प्रिय बेटा
स्नेहाशीष
       बेटा तुम जहाँ हो कुशल मंगल होगे ऐसा मेरा दिल कहता है । बेटा तुमने गांव से जाने के बाद हमारे हालचाल तो नही पूछे शायद तुम्हारे पास समय नही होगा । इसलिए मै बता देती हू यहाँ सब राजी खुशी है ।
   बेटा जब यह खत तुम्हे मिलेगा तो निश्चित ही तुम्हे मेरी याद आएगी और आँखो से आँसू निकल आऐगे । पर बेटा आँख मत बहने देना , क्योंकि बेटा मै तुम्हारी आँखो मे आँसू नही देख सकती ।

☆ बेटा तेरे बाबा ने तुम्हे आशीर्वाद भेजा है ।   बेटा तेरे बाबा गांव मे सीना चौडा करके घुमते है और सभी को कहते है कि मेरा बेटा परदेश मे है । लेकिन बेटा वे अन्दर से बहुत अकेले है । आज वो बाँस की लाठी के सारे चलते है उनके बुढापे की लाठी तो परदेश मे है  ।
बेटा तेरे बाबा बुढापे मे भी इतना काम करते है जितना तुम छोटे थे तब करते थे । आज जब काम करते थक जाते है तो पानी के लिए तेरा ही नाम पुकारते है ।

☆ बेटा तेरी लाडली बहना सयानी हो गई है । उसके भी हाथ पीले करने है । तेरी बहना वर्षो से राखी पर चुप चुप करके रोती है इसलिए की कई उसके आँसू तेरे बाबा और मुझको कमजोर न कर दे ।
☆  बेटा  मेरा तो क्या ? तू खुश है तो मै तो सदा खुश हूँ  । बेटा जब तुम पैदा हुए थे तब मैने और तेरे बाबा बड़े सपने संजोए थे । तेरे बाबा तुझे पढा कर बड़ा अफसर बनाना चाहते थे लेकिन तुम तो इतना बड़ा बन गया कि अपने माँ - बाप को भूल गया  ।
बेटा इस आखातीज पर रामलाल जी ने अपने बेटे की शादी  बड़े धूमधाम से की , बेटा तेरे बाबा भी तेरी शादी ऐसे ही धूमधाम से करना चाहते थे पर तुम तो ..........

☆ बेटा तुझे यहा से गए 8 साल हो गए पर बेटा तुमने एक बार भी अपनी बुढ़ी माँ का हाल नही पूछा ।
बेटा कुछ समय तक तु रूपये भेजता था पर अब वो भी भेजना बन कर दिया ।
बेटा हमे कागज के टुकडे नही चाहिए।  मेरे जिगर के टुकडे एक बार अपनी माँ को मिलने आ जा ।
☆ बेटा यहाँ पर लोग कहते है कि तुमने वहाँ ब्याव कर लिया होगा और अब तुम यहा नही आओगे । बेटा यदि यह सच है तो एक बार मुझे अपनी बहू का मुँह तो दिखा दे । बेटा एक बार तो आ जा , अपनी दुखियारी माँ की तो पुकार सुन ।

☆  बेटा शायद तुम्हे याद होगा कि तुम्हे पढाने  के लिए हमने अपने पुरखो की दि हुई जमीन गिरवी रखी थी । बेटा तुम तो जानते ही हो हमारे लिए जमीन माँ है , बेटा अपनी माँ को मुक्त कराने के लिए तो एक बार आ जा ।
बेटा यहा की हालत तो ओर भी विकट है पर मेरे आँखो के तारे मै तुझे यह सब बता कर दुखी नही कर सकती।
बेटा जब गाँव मे कोई गाडी आती है तो चौखट पर आ जाती हूँ इसी आस मे की मोटर मे तू आया होगा ।
लेकिन तुने तो हमारी सुध लेने की भी कोशिश नही की । लेकिन बेटा बस एक बार आ जा । बेटा इन कानो मे अब सुनाई नही देता पर  तेरे मुँह से माँ सुनना चाहते है ।

● बेटा अपने बुढे बाबा को पानी पिलाने एक बार तो आ जा  ।
● अपनी बहना की डोली डोली उठाने तो आ जा फिर चाहे मेरी अर्थी को काँधा देने मत आना ।
● बेटा अपनी माँ को मुक्त कराने एक बार तो आ जा ।
बेटा एक बार तो आजा ।
बेटा एक बार ............
तुम्हारे इंतजाम मे
तुम्हारी
माँ